गोरखपुर: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में है, जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पीएच.डी. प्रवेश 2024-25 में आरक्षित श्रेणी की रिक्त सीटों को अनारक्षित में बदलने का निर्णय लिया गया है। शोध एवं विकास प्रकोष्ठ की ओर से जारी आदेश में निर्देश दिया गया है कि जिन विभागों में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी चयनित नहीं हो सके हैं, वहां की सीटों को अनारक्षित करते हुए 2 जुलाई 2025 तक पुनः प्रवेश प्रक्रिया पूरी की जाए। इस निर्णय के विरोध में दर्जनों छात्रों ने कुलपति महोदया को ज्ञापन सौंपते हुए इसे संविधान, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशा-निर्देशों और उत्तर प्रदेश शासन के आरक्षण संबंधी नियमों के विरुद्ध बताया है। छात्रों का कहना है कि यदि यह निर्णय लागू किया गया तो यह न केवल आरक्षण नीति की हत्या होगी, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित सामाजिक न्याय की भावना का भी खुला अपमान होगा।
ज्ञापन में छात्रों ने बताया कि आरक्षित वर्ग के अनेक छात्रों ने प्रवेश के लिए आवेदन किया था, किंतु कटऑफ अधिक होने के कारण वे अर्हता प्राप्त नहीं कर सके। इसका अर्थ यह नहीं कि वे वर्ग अभ्यर्थियों से रिक्त हैं। बल्कि यह विश्वविद्यालय की कठोर नीति का परिणाम है, जो परोक्ष रूप से वंचित वर्गों को बाहर रखने का प्रयास है। छात्रों ने UGC रेगुलेशन 2016 की धारा 5.4.2 और उत्तर प्रदेश शासन के शासनादेश (GO No. 20/1/2008) का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षित सीटों को खाली रखा जाना चाहिए, उन्हें अनारक्षित में परिवर्तित करना पूरी तरह असंवैधानिक है। छात्रों ने सुझाव दिया कि यदि विश्वविद्यालय छात्र हित में चिंतित है, तो वह कटऑफ में युक्तिसंगत ढील देकर योग्य लेकिन वंचित छात्रों को अवसर दे, न कि सीटों को सामान्य वर्ग को हस्तांतरित करे। उनका कहना है कि इस प्रकार की नीति से मेरिट, परीक्षा और आरक्षण – तीनों की गरिमा समाप्त हो जाती है।
इस संदर्भ में शोध छात्र, छात्र नेता पवन कुमार ने कहा, “यह निर्णय संविधान, सामाजिक न्याय और राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित आरक्षण नीति की भावना के खिलाफ है। यदि विश्वविद्यालय जैसे संस्थान ही संविधान की अवहेलना करेंगे, तो आम छात्र संविधान पर कैसे विश्वास रखेगा?” वहीं छात्रनेता भास्कर चौधरी ने कहा किविश्वविद्यालय को यह अन्याय पूर्ण फैसला वापस लेना होगा “हम इस अन्याय के खिलाफ हर लोकतांत्रिक और कानूनी रास्ता अपनाने को बाध्य होंगे ।” छात्रनेता विनय यादव ने कहा कि “विश्वविद्यालय की चुप्पी और विवेकहीन निर्णयों ने छात्र समुदाय को गहरा आहत किया है। यह केवल प्रवेश नीति का मामला नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक समानता के मूलभूत अधिकारों की रक्षा का प्रश्न बन चुका है।”
ज्ञापन देने वाले प्रमुख छात्र:
पवन कुमार, भास्कर चौधरी, शिव शंकर गौड़, सतीश सिंघम, अभिजीत यादव, विनय यादव, गंगेश कुमार, रामकृष्ण, चंदन यादव, सतपाल यादव,गोविंद कुमार, नितेश कुमार, आरपी, अरस्तू,हरीशचंद सहित दर्जनों छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


